MISSION SHAKTI || मिशन शक्ति

MISSION SHAKTI || मिशन शक्ति

MISSION SHAKTI || मिशन शक्ति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को घोषणा कि डीआरडीओ ( DRDO ) द्वारा विकसित एंटी-सैटेलाइट सिस्टम ( A-SAT ) ने पृथ्वी की निचली कक्षा ( low earth orbit ) में 300 km दूर स्थित एवं घूम रहे उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। इस परीक्षण को मिशन शक्ति ( MISSION SHAKTI ) का नाम दिया गया हैं । भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बन गया है जिसने यह क्षमता हासिल की है।

ANTI SATELLITE SYSTEM (एंटी-सैटेलाइट सिस्टम ) क्या होता है ?
MISSION SHAKTI मिशन शक्ति
MISSION SHAKTI मिशन शक्ति
  1. यह जमीन से लॉन्च की गई मिसाइलों के जरिए अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट करने की तकनीकी क्षमता है
  2. DRDO ने ओडिशा के बालासोर के पास डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप ( व्हीलर द्वीप) से एक मिसाइल लॉन्च की।
  3. इस प्रौद्योगिकी का लक्ष्य दुश्मन देशों के स्वामित्व वाले उपग्रहों को नष्ट करना है।
  4. इस उपग्रह (MIRCOSAT-R) को, जिसे इस साल 24 जनवरी को इसरो ( ISRO) द्वारा लॉन्च किया गया था, डीआरडीओ द्वारा निर्मित किया गया था।
  5. A-SAT मिसाइल सिस्‍टम अग्नि मिसाइल और एडवांस्‍ड एयर डिफेंस सिस्‍टम का मिश्रण है। यह इंटरसेप्टर मिसाइल दो सॉलिड रॉकेट बूस्टरों सहित तीन चरणों वाली मिसाइल है। भारत में इस मिसाइल का विकास DRDO ने किया है।
  6. गौरतलब है कि भारत ने 2012 में भी टेस्ट किये थे और अपनी इस क्षमता का प्रदर्शन किया था, लेकिन उस समय सरकार ने इसके परीक्षण की अनुमति यह कहते हुए नहीं दी थी कि नष्ट हुए सैटेलाइट का मलबा अन्य देशों के सैटेलाइट को क्षति पहुँचा सकता है।
अन्य देशो द्वारा पूर्व मे किए गए प्रयास
  1. 1959 में अमेरिकी सेना ने पहला ए-सैट परीक्षण किया था।
  2. तत्कालीन सोवियत संघ ने एक साल बाद इसका परीक्षण किया।
  3. इसके बाद, दोनों देशों ने 1980 के दशक की शुरुआत तक ऐसे परीक्षणों की एक श्रृंखला को अंजाम दिया।
  4. इसके बाद 2007 में चीन ने अपने एक खराब पड़े मौसम संबंधी उपग्रह को नष्ट किया ।
  5. एक साल बाद, अमेरिका ने एक गैर-कार्यात्मक जासूसी उपग्रह को नष्ट किया ।
LOW EARTH ORBIT क्या है ?

पृथ्वी की सतह से लगभग 180 km से 2,000 किलोमीटर की ऊँचाई तक के क्षेत्र को लो अर्थ ओरबिट यानि पृथ्वी की निचली कक्षा कहा जाता जाता है । यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योकि अधिकतर उपग्रह इसी परिधि मे उपस्थित है ।

इसका कारण यह है की पृथ्वी की सतह से सबसे नजदीक होने की वजह से इस ऑर्बिट में किसी उपग्रह को स्थापित करने के लिये कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है इस कक्षा में अधिकतर , मौसम की निगरानी करने वाले उपग्रह और जासूसी उपग्रहों को स्थापित किया जाता है ।पृथ्वी की कक्षाएँ अनिवार्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं: पृथ्वी की उच्च कक्षा, पृथ्वी की मध्यम कक्षा, और पृथ्वी की निचली  कक्षा ।

A-SAT आत्म रक्षा अथवा निवारक( deterrent) के रूप मे
  1. . उपग्रह प्रणालियाँ किसी भी देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर होते हैं।
  2. नेविगेशन सिस्टम, संचार नेटवर्क, बैंकिंग, प्रसारण, स्टॉक-मार्केट, मौसम का पूर्वानुमान … ये सभी अब उपग्रह आधारित हैं।
  3. एक उपग्रह को नष्ट करने से उपरोक्त सभी संचार अनुप्रयोग बेकार हो जाएंगे।
  4. यह दुश्मन के बुनियादी ढांचे को पंगु बना सकता है किन्तु इससे मानव जीवन को कोई खतरा नहीं है।
  5. यह दुश्मन देशो की निगरानी क्षमताओं को नष्ट कर सकता है।
  6. यदि कोई हमारे देश के उपग्रह नेटवर्क को नष्ट करने का विचार करे उसके लिए यह प्रयोग एक अंतरिक्ष निवारक के रूप में भी काम करता है।
क्या उपग्रह को बाधित करने का कोई अन्य रास्ता भी है?
  1. रेडियो संकेतों मे हस्तक्षेप करके उपग्रहों से संचार को जाम करने के लिए technology विकसित किया जा रहा है।
  2. एक अन्य विकल्प है, लक्षित उपग्रहों के निकट किसी अन्य उपग्रह को भेजना जिससे लक्षित उपग्रह अपने निश्चित कक्षा से विचलित हो जाए । अब, कई अंतरिक्ष एजेंसियां इस close proximity प्रौद्योगिकियों के विकास पर काम कर रही हैं।
  3. तीसरा विकल्प उपग्रहों के सेंसर को नष्ट करने के लिए जमीन-आधारित लेजर का उपयोग है।
  4. इनमें से कोई भी प्रौद्योगिकी अभी उपयोग मे आने के लिए परिपक्व नहीं है।
इस प्रयोग से संबन्धित चुनौतिया क्या हैं ?
  1. अन्तरिक्ष मलबाजब एक उपग्रह को मिसाइल द्वारा नष्ट कर दिया जाता है, तो यह छोटे टुकड़ों में बिखर जाता है और अंतरिक्ष मलबे में परिवर्तित हो जाता है। यह परिचालन( live ) उपग्रहों से टकरा सकता है और उन्हें निष्क्रिय बना सकता है। अंतरिक्ष में लॉन्च की गई कोई भी चीज अंतरिक्ष में लगभग हमेशा के लिए रहती है, जब तक कि इसे विशेष रूप से नीचे नहीं लाया जाता या दशकों या सदियों से धीरे-धीरे विघटित नहीं किया जाता।नासा के अनुसार, अंतरिक्ष में 19,137 मानव निर्मित बड़े आकार की वस्तुए हैं जिनमे सक्रिय और निष्क्रिय उपग्रह, रॉकेट और उनके हिस्से शामिल हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, अंतरिक्ष में एक cm या उससे ऊपर आकार की अनुमानित 7,50,000 वस्तुएं हैं ।

विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारतीय परीक्षण निचले वातावरण में किया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अधिक अंतरिक्ष मलबा उत्पन्न ना हो।बताया गया है की जो भी मलबा उत्पन्न होगा, वह क्षय होगा और हफ्तों में पृथ्वी पर वापस गिर जाएगा ।

  1. स्पेस वारहालाँकि अभी तक ऐसा कोई अवसर नहीं आया है, जब किसी देश ने किसी अन्य देश के उपग्रह को निशाना बनाया हो, लेकिन अंतरिक्ष में बढ़ती होड़ को देखते हुए इस आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता। सैटेलाइट्स के ज़रिये दुनियाभर की हलचलों पर नज़र रखी जाती है,अपनी सेनाओं के लिये खुफिया जानकारियाँ जुटाई जाती हैं,सैटेलाइट्स की मदद से ही विमान GPRS की सहायता से अपने निश्चित ठिकाने तक पहुँचते हैं और युद्धक विमान अपना टारगेट निश्चित करते हैं। लेकिन अब इन्हीं सैटेलाइट्स पर खतरा मंडरा रहा है और ये उपग्रह भी धरती पर मौजूद मिसाइलों की रेंज में आ चुके हैं।
  2. पृथ्वी की सतह से किसी भी उपग्रह को निशाना बना कर नष्ट करना असान नहीं होता। वे इतनी तेज़ी से पृथ्वी की कक्षा में भ्रमण कर रहे होते हैं कि उन पर निशाना साधने में थोड़ी-सी भी असावधानी या आकलन में गड़बड़ी से न सिर्फ वार खाली जा सकता है, बल्कि वह किसी अन्य उपग्रह के लिये भी खतरनाक साबित हो सकता है।
इस संबंध मे अंतराष्ट्रीय संधि
  1. 1967 की बाहरी अन्तरिक्ष संधि( outer space treaty) है। भारत भी इसका एक हस्ताक्षरकर्ता है।
  2. यह देशों को पृथ्वी की कक्षा मे “परमाणु हथियार ले जाने वाली कोई भी वस्तु या किसी अन्य प्रकार के सामूहिक विनाश के हथियार ले जाने से रोकता है, “।
  3. यह चंद्रमा या बाहरी अंतरिक्ष जैसे खगोलीय पिंडों पर इस तरह के हथियारों को तैनात करने पर भी प्रतिबंध लगाता है क्योकि केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अन्य खगोलीय पिंडों का उपयोग किया जाना चाहिए।
  4. इस मामले मे चार ओर बहुपक्षीय संधियाँ हैं जो बाहरी अंतरिक्ष से संबन्धित विशिष्ट अवधारणाओं से संबंधित हैं। लेकिन, उनमें से कोई भी इस तरह के परीक्षण पर रोक नहीं लगाता है जो भारत ने किया है।

निष्कर्ष : 

यह तथ्य कि यह एंटी-सैटेलाइट तकनीक स्वदेशी रूप से विकसित है, भारत की साख में इजाफा करती है। कई दशकों तक भारत को प्रमुख प्रौद्योगिकियों को प्राप्त करने से दूर रखा गया था, जिससे देश अपनी खुद की अंतरिक्ष और परमाणु क्षमताओं को विकसित करने के लिए मजबूर हो गया। ASAT का उपयोग भारत के 1998 के परमाणु परीक्षणों की तरह ही देखा जाता है। इस प्रौद्योगिकी का अधिग्रहण और प्रदर्शन भारत को देशों के एक कुलीन समूह का सदस्य बनाता है।उपग्रह-रोधी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारत की सुरक्षा चुनौतियों पर भी ध्यान केंद्रित करती है।

इस टॉपिक से सम्बंधित संभावित प्रश्न
  1. एंटी-सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट (मिशन शक्ति) से आप क्या समझते हैं? दुश्मन के उपग्रहों को निशाना बनाने के लिए विभिन्न अन्य तरीकों की जाँच करें।
  2. मिशन शक्ति क्या है और यह भारत के लिए पथ-प्रदर्शक क्यों है?
  3. A-SAT टेस्ट के परिपेक्ष मे बताइये कि ,भारत के सॉफ्ट स्टेट कि छवि पर क्या प्रभाव पड़ा ।
  4. भारत की सुरक्षा चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए निम्न कथन पर टिप्पणी कीजिये है।उपग्रह-रोधी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी एक प्रकार से निवारक के रूप मे कार्य कर सकती हैं। “
  5. कचरे की समस्या अब प्र्थ्वी के साथ साथ ब्रह्मांड मे भी चिंता का विषय बन गयी है।इस संबंध मे हाल ही मे हुए मिशन शक्ति से उद्धरण दीजिये।
  6. उपग्रह-रोधी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी अन्तरिक्ष को युद्ध का मैदान भी बना सकती है । क्या आप इस बात से सहमत हैं?
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NOTE :
 
हमने इस पोस्ट की कुछ जानकारी/चित्र ऑथेंटिक वेबसाइट से लिया हैं। यह पोस्ट BPSC /UPSC/STATE PCS एग्जाम के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण हैं। अगर आपका किसी भी प्रकार का कोई सुझाव या शिकायत है तो हमें bpscrightway@gmail.com पर संपर्क कर सकते है। हम जल्द से जल्द उस त्रुटि को दूर करने का प्रयास करेंगे।

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